Shiv Tandav Stotra Lyrics: संपूर्ण शिव तांडव स्तोत्रम् हिंदी अर्थ और महत्व के साथ

हिंदू सनातन परंपरा में भगवान शिव की आराधना के कई रूप हैं, लेकिन लंकापति रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्रम् (Shiv Tandav Stotra) महादेव को प्रसन्न करने का सबसे शक्तिशाली और ऊर्जावान माध्यम माना जाता है। इस स्तोत्र की अनूठी लय, कठिन छंद और संस्कृत के उच्च शब्द न केवल मन में असीम ऊर्जा का…

Shiv Tandav Stotra Lyrics

हिंदू सनातन परंपरा में भगवान शिव की आराधना के कई रूप हैं, लेकिन लंकापति रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्रम् (Shiv Tandav Stotra) महादेव को प्रसन्न करने का सबसे शक्तिशाली और ऊर्जावान माध्यम माना जाता है। इस स्तोत्र की अनूठी लय, कठिन छंद और संस्कृत के उच्च शब्द न केवल मन में असीम ऊर्जा का संचार करते हैं, बल्कि वातावरण की नकारात्मकता को भी नष्ट कर देते हैं।

यदि आप अपनी दैनिक पूजा, सावन मास या महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर पाठ करने के लिए Shiv Tandav Stotra Lyrics खोज रहे हैं, तो नीचे इसका संपूर्ण और शुद्ध पाठ दिया गया है।

शिव तांडव स्तोत्रम् (मूल संस्कृत पाठ)

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर- स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे (क्वचिच्चिदम्बरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा- कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे। मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर- प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः। भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्। सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः ॥६॥

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके। धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्- कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः। निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कळानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥८॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा- वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्। स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी- रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्। स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस- द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्। धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल- ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो- र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः। तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥१२॥

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्। विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्। हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥१४॥

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे। तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१५॥

॥ इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

शिव तांडव स्तोत्र का महत्व और लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति नियमित रूप से या विशेषकर प्रदोष काल (शाम के समय) में इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • वाणी में शुद्धि: इसके कठिन शब्दों के निरंतर उच्चारण से वाणी स्पष्ट और प्रभावशाली होती है।
  • मानसिक शक्ति: यह स्तोत्र आत्मविश्वास बढ़ाता है और डिप्रेशन या मानसिक तनाव को दूर करता है।
  • कालसर्प दोष से मुक्ति: शिव जी के गले में भुजंग (सांप) की माला है, इसलिए इसके पाठ से कुंडली के राहु-केतु और कालसर्प दोष शांत होते हैं।
  • धन और समृद्धि: स्तोत्र की अंतिम पंक्तियों के अनुसार, इसके पाठ से भगवान भोलेनाथ स्थिर लक्ष्मी और सुख-समृद्धि का वरदान देते हैं।

यदि आपको यह लेख और शिव तांडव स्तोत्रम् का यह शुद्ध पाठ पसंद आया हो, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ अवश्य शेयर करें। कमेंट में “हर हर महादेव” लिखना न भूलें!



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